POCSO केस में दिल्ली हाई कोर्ट की बड़ी राहत, आपसी सहमति से बने रिश्ते को देखते हुए आरोपी को मिली जमानत

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत आरोपी एक युवक को नियमित जमानत दे दी है। अदालत ने इस मामले में यह पाया कि आरोपी और पीड़िता दोनों किशोर थे और उनके बीच का रिश्ता आपसी सहमति से बना था। जस्टिस मिनी पुष्करणा ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को और अधिक समय तक जेल में रखने से कोई खास मकसद पूरा नहीं होगा, इसलिए उसे जमानत दी जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के 'रोमियो-जूलियट' क्लॉज का दिया हवाला
यह मामला जनवरी 2026 में सरिता विहार पुलिस स्टेशन में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है। पीड़िता के पिता ने शिकायत की थी कि उनकी 16 वर्षीय बेटी लापता है। मई में पुलिस ने पीड़िता को दिल्ली के बाहरी इलाके में एक किराए के मकान में आरोपी के साथ पाया, जिसके बाद आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया था। जांच के दौरान आरोपी ने दावा किया कि उसने पीड़िता से शादी कर ली थी और वे साथ रह रहे थे, हालांकि शादी का कोई कानूनी सबूत पेश नहीं किया गया। मेडिकल जांच में पीड़िता गर्भवती पाई गई थी, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि नाबालिग होने के दौरान उनके बीच शारीरिक संबंध बने थे।
जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान आरोपी के वकीलों ने दलील दी कि दोनों किशोर थे और उनके बीच सहमति थी, इसलिए इस मामले में 'रोमियो-जूलियट' क्लॉज लागू होना चाहिए। अदालत ने जमानत देते समय सुप्रीम कोर्ट के 'स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश बनाम अनुग्रह और अन्य' मामले के फैसले का संदर्भ लिया। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही यह संकेत दिया था कि कई बार परिवार किशोरों के रोमांटिक रिश्तों को दबाने के लिए पॉक्सो एक्ट का गलत इस्तेमाल करते हैं, और ऐसे मामलों में सख्त नियमों के बजाय लचीलेपन की जरूरत है।
दूसरी ओर, सरकारी वकील सुनील कुमार गौतम ने दलील दी कि यह एक गंभीर अपराध है और जमानत मिलने पर आरोपी गवाहों या पीड़िता के परिवार को प्रभावित कर सकता है। लेकिन कोर्ट ने आरोपी के पिछले चार महीनों के संतोषजनक व्यवहार और पीड़िता के माता-पिता द्वारा अब इस रिश्ते को स्वीकार कर लेने की बात पर गौर किया। कोर्ट ने 20,000 रुपये के पर्सनल बॉन्ड और एक जमानतदार की शर्त पर आरोपी की रिहाई का आदेश दिया।