दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: स्त्रीधन की रिकवरी के लिए कस्टोडियल इन्टेरोगेशन जरूरी नहीं, 80 वर्षीय को अग्रिम जमानत

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि केवल स्त्रीधन की रिकवरी के लिए कस्टोडियल इन्टेरोगेशन (हिरासत में पूछताछ) जरूरी नहीं है। अदालत ने कहा कि ऐसे रिकवरी के प्रयास जमानत अदालत के दायरे में नहीं आते हैं। इस बारे में अधिक जानकारी के लिए ANI News पर रिपोर्ट पढ़ें। न्यायमूर्ति गिरीश कथपालिया ने इस मामले की सुनवाई की और कहा कि यदि हिरासत में पूछताछ का एकमात्र कारण स्त्रीधन की रिकवरी है, तो यह कार्यवाही के लिए आवश्यक नहीं है।
80 वर्षीय सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी को राहत
अदालत ने एक matrimonial dispute (वैवाहिक विवाद) के मामले में आरोपी 80 वर्षीय सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी को अग्रिम जमानत दे दी है। यह कानूनी कार्यवाही 29 अप्रैल 2026 को दर्ज की गई एक एफआईआर से संबंधित है, जिसमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A और 406 के अलावा धारा 354, 354A और 376 तथा भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 74 जोड़ी गई थीं। अदालत ने आरोपी की स्वतंत्रता को बनाए रखते हुए उसे राहत प्रदान की है।
जांच अधिकारी के दावों पर अदालत की टिप्पणी
29 सितंबर 2026 को हुई सुनवाई के दौरान, अदालत ने जांच अधिकारी के दावों पर संदेह व्यक्त किया। अदालत ने पाया कि मामले की डायरी में बिना किसी सहायक साक्ष्य के आरोपी को मौखिक नोटिस जारी करने के दावे भरोसेमंद नहीं थे। न्यायमूर्ति कथपालिया ने यह निर्धारित किया कि इस 80 वर्षीय बुजुर्ग को उसकी स्वतंत्रता से वंचित करने का कोई वैध कारण नहीं था।
अग्रिम जमानत की शर्तें और अन्य कानूनी रास्ते
अग्रिम जमानत की शर्त के रूप में, आरोपी को गिरफ्तारी की स्थिति में 25,000 रुपये का व्यक्तिगत मुचलका और उतनी ही राशि की एक जमानत राशि जमा करनी होगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि स्त्रीधन की रिकवरी चाहने वाले किसी भी शिकायतकर्ता को जमानत अदालत के दायरे से बाहर जाकर उचित कानूनी उपाय तलाशने चाहिए। अदालत के इस निर्देश से स्पष्ट है कि रिकवरी के लिए अन्य कानूनी रास्ते खुले हैं।