दिल्ली हाई कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, शारीरिक श्रम करने वालों को नहीं मिलता सही मूल्य

शारीरिक श्रम और मजदूरों की स्थिति पर हाई कोर्ट की टिप्पणी
दिल्ली हाई कोर्ट ने वीर पाल बनाम राज्य मामले में सुनवाई के दौरान शारीरिक श्रम के महत्व और मजदूरों की स्थिति को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने 18 सितंबर 2026 को दिए अपने फैसले में कहा कि समाज शारीरिक श्रम का मूल्यांकन करने में विफल रहा है। मजदूरों का दिनभर का कड़ा परिश्रम रात में सुकून भरी नींद की मांग करता है, लेकिन यह बुनियादी जरूरत देश के मजदूरों के लिए एक कभी न खत्म होने वाला संकट बन गई है। न्यायमूर्ति विमल कुमार यादव ने पश्चिमी देशों की तुलना करते हुए कहा कि वहां शारीरिक श्रम को उचित मुआवजा और मूल्य दिया जाता है, जबकि देश की घरेलू स्थिति बहुत दयनीय है। यह मामला 17 मार्च 2002 की रात का है जब चांदनी चौक के लाजपत राय मार्केट में एक दुकान के बरामदे में सो रहे राजिंदर कुमार नामक मजदूर पर हमला किया गया था।
घटना का विवरण और निचली अदालत का फैसला
घटना की रात जब मजदूर राजिंदर कुमार ने हंगामा कर रहे लोगों को रोकने के लिए कहा, तो अपीलकर्ता ने उसे धक्का दिया और फिर मोची के चमड़ा काटने वाले औजार 'रापी' से हमला कर दिया। इस हमले में राजिंदर के गाल से लेकर सीने तक गंभीर घाव हो गया जिससे वह बेहोश हो गया और उसे सर्जरी की आवश्यकता पड़ी। शोर सुनकर मौके पर पहुंचे एक सिपाही ने भाग रहे अपीलकर्ता को पकड़ लिया। निचली अदालत ने अपीलकर्ता को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 307 के तहत दोषी ठहराया था और पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ हाई कोर्ट में अपील दायर की गई थी जिसमें वकील ने तर्क दिया कि हमला बिना किसी पूर्व योजना के अचानक हुआ था और यह हत्या के प्रयास की श्रेणी में नहीं आता है।
हाई कोर्ट द्वारा सजा में बदलाव और फैसला
अदालत ने कई पुराने मामलों के उदाहरणों का हवाला देते हुए इरादे का अनुमान लगाने वाले कारकों जैसे हथियार की प्रकृति, उसके इस्तेमाल के तरीके, वार किए गए शरीर के हिस्से और हमलों की संख्या का विश्लेषण किया। अदालत ने पाया कि रापी एक खतरनाक हथियार था, लेकिन उसे सीधा वार करने के बजाय लंबवत तरीके से चलाया गया था। लगभग 14 इंच लंबे और 1.5 इंच चौड़े इस घाव को अदालत ने धारा 320 के तहत गंभीर चोट के कानूनी पैमाने पर खरा नहीं उतरने वाला माना। अदालत ने माना कि धारा 307 के लिए आवश्यक इरादा या ज्ञान मौजूद नहीं था, जिसके बाद सजा को IPC की धारा 324 में बदल दिया गया। अपीलकर्ता की साफ छवि और 2002 के पुराने मामले को ध्यान में रखते हुए सजा को घटाकर तीन साल कर दिया गया और जुर्माना बरकरार रखा गया।