2020 दिल्ली दंगे: स्वतंत्र जांच की मांग खारिज, हाई कोर्ट ने कहा- पुलिस जांच में नहीं दिखी कोई बड़ी खामी

Kittu Kumari5 October 20262 min read0 viewsDelhi Local
2020 दिल्ली दंगे: स्वतंत्र जांच की मांग खारिज, हाई कोर्ट ने कहा- पुलिस जांच में नहीं दिखी कोई बड़ी खामी

दिल्ली हाई कोर्ट ने साल 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों की स्वतंत्र जांच कराने की मांग वाली याचिकाओं को सिरे से खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसके पास ऐसा कोई ठोस सबूत या सामग्री नहीं है, जिससे यह साबित हो कि दिल्ली पुलिस की जांच इतनी ज्यादा प्रभावित या अविश्वसनीय थी कि इसे किसी अन्य स्वतंत्र एजेंसी को सौंपना जरूरी हो।

जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस मनोज जैन की बेंच ने अपनी सुनवाई के दौरान कहा कि दंगों के दौरान पुलिस के कथित दुर्व्यवहार के केवल आरोपों के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि पूरी जांच मशीनरी निष्पक्ष जांच करने में असमर्थ है। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि जांच को किसी दूसरी एजेंसी को सौंपने का आदेश केवल उन्हीं दुर्लभ और असाधारण परिस्थितियों में दिया जाता है, जहां यह साबित हो जाए कि मौजूदा जांच पूरी तरह से दूषित हो चुकी है।

नेताओं के खिलाफ FIR और राजनीतिक चयनात्मकता पर टिप्पणी

DelhiBreakings की हर खबर सबसे पहलेJoin Channel

याचिकाकर्ताओं ने कुछ राजनीतिक नेताओं द्वारा दिए गए कथित भड़काऊ भाषणों पर FIR दर्ज कराने की मांग भी की थी। हालांकि, कोर्ट ने इस मांग को भी अस्वीकार कर दिया। अदालत ने पाया कि याचिका में दिए गए वीडियो रिकॉर्डिंग, अखबार की कतरनें और ट्रांसक्रिप्ट अधूरे थे और उनका संदर्भ स्पष्ट नहीं था। बेंच ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ताओं द्वारा कुछ खास व्यक्तियों और भाषणों को निशाना बनाए जाने में "राजनीतिक चयनात्मकता" (Political Selectivity) नजर आती है।

कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए बताया कि फरवरी 2020 की हिंसा में आगजनी, तोड़फोड़ और पत्थरबाजी हुई थी, जिससे घरों, दुकानों और पूजा स्थलों को भारी नुकसान पहुंचा था। लेकिन अब, जब आपराधिक न्याय प्रक्रिया काफी आगे बढ़ चुकी है, तब पूरी जांच को दोबारा शुरू करना या ट्रांसफर करना गलत होगा।

अदालत ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि अब तक 757 आपराधिक मामले दर्ज किए जा चुके हैं, जिनमें से 369 मामलों में चार्जशीट दाखिल हो चुकी है और 212 मामले अदालतों में लंबित हैं। अब इस स्तर पर जांच को स्थानांतरित करने से पहले से चल रहे मुकदमों और जांचों में बाधा आएगी।

हालांकि, हाई कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि पुलिसकर्मियों को किसी भी गलती के लिए छूट मिलेगी। अगर किसी अधिकारी के खिलाफ कदाचार या आपराधिक कृत्य का ठोस सबूत मिलता है, तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है और पीड़ित व्यक्ति इसके लिए उचित कानूनी रास्ता अपना सकता है।

Share:

Comments

Leave a comment