दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मैट्रिमोनियल फ्रॉड आरोपी की जमानत खारिज और POCSO पर सख्त रुख

दिल्ली हाईकोर्ट ने 24 सितंबर 2026 को यौन अपराध के मामलों में दो बड़े फैसले सुनाए हैं। अदालत ने मैट्रिमोनियल वेबसाइट पर फर्जी प्रोफाइल बनाकर महिलाओं से दुष्कर्म करने वाले आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी है और साथ ही POCSO एक्ट के मामलों को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट की है। इस खबर में जानिए अदालत की इन दोनों बड़ी कार्रवाइयों के बारे में सभी जरूरी बातें।
- मैट्रिमोनियल फ्रॉड: दिल्ली हाईकोर्ट ने शादी की वेबसाइट पर फर्जी प्रोफाइल बनाने वाले आरोपी की जमानत खारिज की।
- शिकार बनाने का आरोप: अदालत ने आरोपी को 'मासूम लड़कियों का शिकारी' बताया है।
- POCSO मामला: अदालत ने कहा कि POCSO एक्ट के तहत आपराधिक कार्यवाही को समझौते के आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता।
मैट्रिमोनियल वेबसाइट फ्रॉड मामले में जमानत खारिज
न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया ने 22 सितंबर को दिए अपने आदेश में एक ऐसे व्यक्ति की जमानत खारिज कर दी, जिस पर मैट्रिमोनियल वेबसाइटों पर कई फर्जी प्रोफाइल बनाकर महिलाओं के साथ दुष्कर्म करने का आरोप है। अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए सबूतों में एक ही मैट्रिमोनियल प्लेटफॉर्म पर अलग-अलग नाम, उम्र, योग्यता, पेशे और आय विवरण वाले नौ अलग-अलग प्रोफाइल शामिल थे। न्यायमूर्ति कठपालिया ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने प्रथम दृष्टया एक ऐसा मामला स्थापित किया है जिसमें आरोपी को 'मासूम लड़कियों का शिकारी' बताया गया है।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील ने दलील दी कि शिकायतकर्ता एक वयस्क महिला थी जिसे झूठे शादी के वादे के जरिए यौन संबंध बनाने के लिए प्रेरित नहीं किया जा सकता था। वकील ने यह भी बताया कि आरोपी 6 नवंबर 2025 से हिरासत में है और ट्रायल पूरा होने के करीब है। हालांकि, राज्य सरकार ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि कई महिलाओं के साथ ठगी की गई है और कई अन्य संभावित पीड़ित महिलाएं डर के कारण शिकायत दर्ज कराने से झिझक रही हैं। अदालत का यह फैसला डिजिटल साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और एक वॉयस रिकॉर्डिंग के चल रहे फोरेंसिक विश्लेषण पर आधारित था। इस वॉयस रिकॉर्डिंग में, जिसे शुरू में पुलिस चार्जशीट में शामिल नहीं किया गया था, आरोपी कथित तौर पर कई महिलाओं को धोखा देने की बात स्वीकार करता है और उसके पास अशील तस्वीरें होने की बात भी सामने आई है।
POCSO एक्ट मामलों में समझौते के आधार पर कार्यवाही रद्द नहीं होगी
24 सितंबर 2026 को एक अलग मामले में, दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति सचिन दत्ता ने फैसला सुनाया कि बच्चों के यौन उत्पीड़न से संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत आपराधिक कार्यवाही को आरोपी और पीड़ित या उनके परिवार के बीच हुए समझौते के आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे अपराध जघन्य प्रकृति के होते हैं और इनके गंभीर सामाजिक परिणाम होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए, पीठ ने कहा कि दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराध निजी प्रकृति के नहीं होते हैं और इन्हें केवल आपसी समझौते के जरिए खत्म नहीं किया जा सकता है। अदालत ने कहा कि ऐसा करने से कानून के उद्देश्यों और न्याय के हितों को ठेस पहुंचेगी।