दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: निजी शिकायतों में संज्ञान लेने से पहले आरोपी का पक्ष सुनना अनिवार्य

Kittu Kumari30 September 20262 min read5 viewsDelhi Local
दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: निजी शिकायतों में संज्ञान लेने से पहले आरोपी का पक्ष सुनना अनिवार्य

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के तहत मजिस्ट्रेट को निजी शिकायत में किसी अपराध का औपचारिक रूप से संज्ञान लेने से पहले प्रस्तावित आरोपी को सुनने का अवसर देना होगा। यह फैसला जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर दुग्गल की खंडपीठ ने सुनाया है, जो BNSS की धारा 223(1) के तहत अनिवार्य प्रक्रिया को स्पष्ट करता है। इस संबंध में अधिक जानकारी के लिए दिल्ली हाईकोर्ट के आधिकारिक आदेश को देखा जा सकता है।

मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी प्रक्रिया

यह फैसला 30 सितंबर 2026 को आधिकारिक रूप से सामने आया, जो डॉ. रीता बख्शी बनाम सीमा बजाज और अन्य तथा अनीता रानी मेहरा व अन्य याचिकाओं में अलग-अलग व्याख्याओं के समाधान से जुड़ा है। इन मामलों को 18 मार्च 2026 को जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा द्वारा बड़ी बेंच को भेजा गया था। अदालत के निर्देशानुसार, मजिस्ट्रेट को पहले शिकायतकर्ता और गवाहों की शपथ पर जांच करनी होगी। इसके बाद यदि अदालत को प्रथम दृष्टया लगता है कि शिकायत खारिज करने के बजाय विचार योग्य है, तो संज्ञान लेने से पहले आरोपी को पक्ष रखने का मौका देना जरूरी है। इस पूरी प्रक्रिया की विस्तृत रिपोर्ट एएनआई न्यूज पर भी उपलब्ध कराई गई है।

पुराने कानून से बदलाव और नया सुरक्षा उपाय

अदालत ने जोर देकर कहा कि यह प्रक्रिया पुरानी आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) 1973 से एक बड़ा बदलाव है, जिसमें प्रारंभिक चरण में आरोपी को सुनने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था। यह अनिवार्य सुनवाई फर्जी या अनावश्यक मुकदमों के खिलाफ एक सुरक्षा उपाय के रूप में काम करती है। इससे आरोपी यह दिखा सकता है कि शिकायत की पहली नजर में भी कोई अपराध नहीं बनता है। यह फैसला प्रवर्तन निदेशालय बनाम परविंदर सिंह के मामले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के अनुरूप है, जो यह पुष्ट करता है कि नए कानून के लागू होने के बाद पूर्व-संज्ञान सुनवाई एक महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय है।

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