दिल्ली में ई-रिक्शा के लिए नए नियम: अब 2.5 लाख से ज्यादा नहीं होंगे रजिस्ट्रेशन

राजधानी की सड़कों पर बढ़ते ट्रैफिक और सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए दिल्ली सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने 'दिल्ली ई-रिक्शा (रजिस्ट्रेशन और ऑपरेशन) स्कीम 2026' का ड्राफ्ट पेश किया है। इस नई पॉलिसी का मुख्य उद्देश्य ई-रिक्शा के बेतरतीब विस्तार को रोकना, सड़क सुरक्षा में सुधार करना और ट्रैफिक जाम की समस्या को कम करना है। सरकार ने इस ड्राफ्ट पर 30 दिनों तक जनता से सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं।
रजिस्ट्रेशन पर लगाम और डिजिटल सर्टिफिकेट की अनिवार्यता
इस नई योजना की सबसे बड़ी बात यह है कि पूरे शहर में ई-रिक्शों की संख्या अब अधिकतम 2.5 लाख तक सीमित होगी। जनवरी 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, पहले ही 2 लाख से ज्यादा ई-रिक्शा रजिस्टर्ड हो चुके हैं, जिसका मतलब है कि अब बहुत कम नए रजिस्ट्रेशन की जगह बचेगी। एक बार यह सीमा पूरी हो जाने के बाद किसी भी नए वाहन का रजिस्ट्रेशन नहीं किया जाएगा।
पारदर्शिता और जवाबदेही तय करने के लिए अब हर ई-रिक्शा के पास एक डिजिटल ई-रिक्शा कंप्लायंस सर्टिफिकेट (ECC) होना अनिवार्य होगा। यह सर्टिफिकेट दो साल के लिए वैध होगा और इसमें मालिक का विवरण, वाहन रजिस्ट्रेशन, ड्राइवर की जानकारी, बीमा, फिटनेस और बैटरी की डिटेल शामिल होगी। मौजूदा ऑपरेटरों को यह सर्टिफिकेट लेने के लिए नोटिफिकेशन के बाद 90 दिनों का समय दिया जाएगा।
सुरक्षा मानकों को लेकर भी सरकार काफी सख्त नजर आ रही है। नए नियमों के तहत:
- एक ई-रिक्शा में ड्राइवर के अलावा अधिकतम चार यात्री ही बैठ सकेंगे।
- ड्राइवर के बगल में बैठना या खड़े होकर यात्रा करना पूरी तरह प्रतिबंधित होगा।
- वाहन की अधिकतम रफ्तार 25 किमी प्रति घंटा और मोटर पावर 2,000 वाट तक सीमित होगी।
- ड्राइवरों के पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस और पब्लिक सर्विस व्हीकल (PSV) बैज होना जरूरी है।
- ध्यान भटकाने वाले ऑडियो सिस्टम के इस्तेमाल पर रोक लगाई जाएगी।
स्वामित्व के नियमों में भी बदलाव किए गए हैं। अब एक व्यक्ति अधिकतम पांच ई-रिक्शा रख सकता है, जबकि कंपनियों, एनजीओ और ड्राइविंग स्कूलों के लिए यह सीमा 100 तक तय की गई है। वहीं, जो एग्रीगेटर 25 या उससे ज्यादा ई-रिक्शा चलाते हैं, उन्हें एक महीने के भीतर एग्रीगेटर लाइसेंस लेना होगा और चार्जिंग या बैटरी स्वैपिंग की पर्याप्त सुविधा देनी होगी।
सरकार का मानना है कि 2014 की पुरानी स्कीम अब पर्याप्त नहीं थी। खासकर स्कूली बच्चों की ओवरलोडिंग और असुरक्षित बैटरी तकनीक जैसी समस्याओं को देखते हुए यह नया ढांचा डिजिटल जवाबदेही और सख्त प्रवर्तन पर जोर देता है।