रेखा गुप्ता के बयानों पर FIR से इनकार, दिल्ली कोर्ट ने कहा- धर्म का अपमान करने का इरादा नहीं
दिल्ली कोर्ट ने सीएम रेखा गुप्ता के खिलाफ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के आरोप में FIR दर्ज करने की याचिका खारिज कर दी है।

दिल्ली की एक अदालत ने मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने की याचिका को खारिज कर दिया है। यह पूरा विवाद मुख्यमंत्री द्वारा सरकारी अधिकारियों की तुलना भगवान हनुमान से करने और उनके संबोधन के दौरान दिए गए बयानों को लेकर था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उपलब्ध दस्तावेजों और सबूतों को देखने के बाद ऐसा नहीं लगता कि मुख्यमंत्री का इरादा जानबूझकर किसी धर्म या धार्मिक मान्यताओं का अपमान करना था।
मामला तब शुरू हुआ जब राम निवास शर्मा नाम के एक व्यक्ति ने कोर्ट में आवेदन दिया। शिकायतकर्ता का आरोप था कि 23 सितंबर 2025 को कश्मीरी गेट आईएसबीटी पर एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान रेखा गुप्ता ने भगवान हनुमान का मजाक उड़ाया। शिकायत में कहा गया कि मुख्यमंत्री ने अधिकारियों की तुलना हनुमान जी से की और उनकी पूंछ में आग लगने वाले प्रसंग का जिक्र करते हुए तंज कसा कि अधिकारी अपनी शक्तियों को तभी याद करते हैं जब उन पर दबाव आता है। शिकायतकर्ता का दावा था कि इन शब्दों से हिंदू भक्तों की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं और यह भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 299 के तहत एक अपराध है।
पुलिस रिपोर्ट और कोर्ट की टिप्पणी
अतिरिक्त मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट अश्वनी पंवार ने इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने पाया कि जिस भाषण पर विवाद था, उसका पूरा वीडियो और ट्रांसक्रिप्ट पहले से ही रिकॉर्ड पर मौजूद है। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि इस मामले में पुलिस जांच की कोई खास जरूरत नहीं है क्योंकि सभी सबूत शिकायतकर्ता की पहुंच में हैं और किसी कस्टोडियल पूछताछ या रिकवरी की आवश्यकता नहीं है।
वहीं, दिल्ली पुलिस द्वारा दाखिल की गई एक्शन टेकन रिपोर्ट (ATR) में एक अलग पहलू सामने आया। पुलिस ने बताया कि अगर पूरे भाषण को देखा जाए, तो मुख्यमंत्री वास्तव में दिल्ली सरकार के कर्मचारियों की प्रतिबद्धता और प्रदर्शन की सराहना कर रही थीं और सकारात्मक तरीके से उनकी तुलना हनुमान जी से कर रही थीं। रिपोर्ट में यह भी जिक्र था कि भाषण के अन्य हिस्सों में मुख्यमंत्री ने हनुमान जी के प्रति सम्मान व्यक्त किया और कहा कि उनके आशीर्वाद से ही कार्य पूरे हो रहे हैं।
इन तमाम तथ्यों को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि बयानों को अलग-थलग करके देखने के बजाय पूरे संदर्भ में देखा जाना चाहिए। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि मुख्यमंत्री का उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं था, इसलिए FIR दर्ज करने का कोई आधार नहीं बनता। हालांकि, कोर्ट ने शिकायतकर्ता को यह छूट दी है कि वह बीएनएस की धारा 223 के अनुसार सबूत पेश कर सकता है।