POCSO केसों में तेजी: दिल्ली हाई कोर्ट ने पुलिस कमिश्नर को समर्पित जांच टीमें बनाने का दिया निर्देश

राजधानी दिल्ली में बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों की जांच में तेजी लाने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट ने एक बड़ा कदम उठाया है। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया है कि वे शहर के सभी पुलिस जिलों में POCSO (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण) अधिनियम के तहत आने वाले मामलों की जांच के लिए समर्पित (Dedicated) टीमें गठित करने की संभावनाओं पर विचार करें।
यह आदेश चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की बेंच ने एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ता जुबेर अली द्वारा दायर इस याचिका का उद्देश्य POCSO मामलों की जांच प्रक्रिया में होने वाली देरी को खत्म करना और कानूनी समय-सीमा का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना था। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को इस प्रस्ताव पर निर्णय लेने के लिए तीन महीने का समय दिया है।
जांच में देरी और कानूनी समय-सीमा का मुद्दा
याचिका में इस बात पर जोर दिया गया कि POCSO मामलों में जांच की धीमी गति न्याय मिलने में बाधा बनती है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि POCSO अधिनियम की धारा 35 के तहत, विशेष अदालत द्वारा संज्ञान लेने के 30 दिनों के भीतर पीड़ित बच्चे के साक्ष्य दर्ज किए जाने चाहिए और मुकदमे को एक वर्ष के भीतर पूरा किया जाना चाहिए।
इसके अलावा, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 193(2) का हवाला देते हुए कहा गया कि निर्दिष्ट POCSO अपराधों की जांच FIR दर्ज होने के दो महीने के भीतर पूरी होनी चाहिए। याचिकाकर्ता ने 5 सितंबर 2026 को पुलिस कमिश्नर को एक औपचारिक आवेदन भी दिया था, जिसमें इन विशेष इकाइयों के गठन की मांग की गई थी।
सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस की ओर से वकील ने कोर्ट को सूचित किया कि याचिकाकर्ता के आवेदन पर विचार किया जा रहा है और आंतरिक स्तर पर जरूरी परामर्श और प्रक्रियाएं चल रही हैं। कोर्ट ने इस बात को स्वीकार किया कि दिल्ली पुलिस इन कानूनी आवश्यकताओं और शिकायतों से अवगत है, जिसके बाद यह निर्देश जारी किया गया।