सिंडिकेट लीडर को पकड़ने में 6 साल की देरी, दिल्ली कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली को बताया 'मजाक'

दिल्ली की एक अदालत ने संगठित अपराध सिंडिकेट के सरगना की गिरफ्तारी में हुई भारी देरी को लेकर दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है। राउज एवेन्यू कोर्ट के स्पेशल MCOCA जज गौरव राव ने पुलिस के उन दावों को 'मजाक' करार दिया, जिसमें कहा गया था कि आरोपी को पकड़ने के लिए 'हर संभव कोशिश' की गई थी।
यह पूरा मामला मुकेश उर्फ पुनीत नाम के एक अपराधी से जुड़ा है, जो बाहरी दिल्ली के नरेला इलाके से अपना नेटवर्क चलाता था। मुकेश के खिलाफ सितंबर 2020 में महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (MCOCA) के तहत मामला दर्ज किया गया था। हैरानी की बात यह है कि इतने कड़े कानून के लागू होने के बावजूद, वह छह साल तक पुलिस की गिरफ्त से बाहर रहा।
अपराधों की लंबी फेहरिस्त और पुलिस की सुस्ती
अदालत ने पाया कि जब 2020 में MCOCA लगाया गया, तब तक मुकेश के खिलाफ पहले से ही करीब 20 FIR दर्ज थीं, जिनमें हत्या और हत्या के प्रयास जैसे गंभीर मामले शामिल थे। लेकिन पुलिस की ढिलाई का आलम यह था कि 2021 से 2024 के बीच उसने आठ और नए अपराध किए, जिनमें फिरौती, अपहरण और मर्डर जैसे केस शामिल थे। वह दिवंगत जितेंद्र मान उर्फ गोगी गैंग से भी जुड़ा रहा।
जज गौरव राव ने कई पुलिस अधिकारियों के प्रदर्शन पर गहरा असंतोष जताया। उन्होंने विशेष रूप से एडिशनल डीसीपी लोकेश्वरन, रविनंदन बीएम और ऋषि कुमार का जिक्र करते हुए कहा कि अधिकारियों की रिपोर्ट न्यायिक सवालों का जवाब देने में नाकाम रही। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की कि संबंधित अधिकारी न तो अदालत के प्रति जवाबदेह दिख रहे हैं और न ही आम जनता के प्रति।
अदालत ने यह भी गौर किया कि दिल्ली पुलिस मुख्यालय ने 11 जुलाई 2024 को एक निर्देश जारी किया था, जिसमें अपराधियों की जल्द गिरफ्तारी और जांच में तेजी लाने को कहा गया था, लेकिन इस मामले में उसे पूरी तरह नजरअंदाज किया गया। कोर्ट ने केवल एसीपी राकेश कुमार की सराहना की, जिन्होंने सितंबर 2025 में केस मिलने के बाद सक्रियता दिखाई और फरवरी 2026 में मुकेश को गिरफ्तार करवाया।
जज ने अपने आदेश में तल्खी से कहा, "अगर एडिशनल डीसीपी के अनुसार यह उनकी 'बेस्ट एफर्ट' (सबसे अच्छी कोशिश) है, तो इस अदालत के पास कहने के लिए कुछ नहीं है।" कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह की लापरवाही MCOCA जैसे कड़े कानून के मकसद को ही खत्म कर देती है, जिसे संगठित अपराध को जड़ से मिटाने के लिए बनाया गया था।