CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन में गिरफ्तार छात्रों को मिली जमानत, कोर्ट ने पुलिस पर हमले को बताया गंभीर

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तार किए गए छात्रों को दिल्ली की एक अदालत ने जमानत दे दी है। हालांकि, अदालत ने जमानत देते समय पुलिस की शिकायतों को गंभीरता से लिया और स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण विरोध के नाम पर ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों पर हमला करना किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता।
पटियाला हाउस कोर्ट के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी अनिमेष कुमार ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि हर व्यक्ति को शांतिपूर्वक विरोध करने का अधिकार है, लेकिन कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाले अधिकारियों के साथ मारपीट करना एक गंभीर चिंता का विषय है। कोर्ट ने अभियोजन पक्ष द्वारा पेश की गई मेडिकल रिपोर्ट (MLC) का जिक्र करते हुए कहा कि पुलिसकर्मी को चोटें आई हैं, जो इस बात की पुष्टि करता है कि प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई थी।
सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान और पहचान छिपाने का आरोप
सुनवाई के दौरान पुलिस ने अदालत को बताया कि प्रदर्शनकारियों ने न केवल गैरकानूनी जमावड़ा किया और सार्वजनिक रास्तों को बाधित किया, बल्कि उन्होंने एक बस की खिड़कियों के शीशे तोड़कर सार्वजनिक संपत्ति को भी नुकसान पहुंचाया। जांच अधिकारी ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपियों ने अपने परिवार और संपर्क विवरणों की पूरी जानकारी नहीं दी, जिससे उनकी पहचान का सत्यापन करने में मुश्किल आई। पुलिस ने आरोपियों को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में रखने की मांग की थी, ताकि वे जांच में बाधा न डाल सकें।
दूसरी ओर, बचाव पक्ष ने दलील दी कि आरोपी युवा छात्र हैं, जिनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और वे केवल अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग कर रहे थे। कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पाया कि हालांकि आरोप गंभीर हैं, लेकिन आरोपी आदतन अपराधी नहीं हैं और उनका पूरा भविष्य उनके सामने है।
इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने छात्रों को 15,000 रुपये के पर्सनल बॉन्ड और एक जमानतदार की शर्त पर रिहा करने का आदेश दिया। अदालत ने सख्त हिदायत दी कि आरोपी जांच में हस्तक्षेप नहीं करेंगे, नियमित रूप से कोर्ट में पेश होंगे और बिना अनुमति के देश नहीं छोड़ेंगे। यदि जमानत की किसी भी शर्त का उल्लंघन हुआ, तो पुलिस उनकी जमानत रद्द करवाने के लिए स्वतंत्र होगी। यह पूरा मामला पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने में भारतीय न्याय संहिता और सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम के तहत दर्ज एफआईआर से जुड़ा है, जिसमें सीसीटीवी फुटेज को सबूत के तौर पर पेश किया गया है।