700 करोड़ रुपये के मेडिकल घोटाले में दिल्ली कोर्ट को बताया गया कि खरीद फाइलें जानबूझकर नष्ट की गईं

दिल्ली सरकार की एंटी-करप्शन ब्रांच (ACB) ने दिल्ली कोर्ट को यह जानकारी दी है कि 700 करोड़ रुपये के मेडिकल प्रोक्योरमेंट स्कैम से जुड़े जरूरी परचेज डॉक्यूमेंट्स को आरोपियों द्वारा सबूत मिटाने के लिए जानबूझकर नष्ट कर दिया गया था। यह पूरा मामला दिल्ली सरकार के अस्पतालों के लिए दवाइयों, सर्जिकल आइटम्स और मेडिकल इक्विपमेंट की खरीद से जुड़ा है, जिसमें टेंडर स्पेसिफिकेशंस में कथित फेरबदल और कॉन्ट्रैक्ट की लागत बढ़ाने के लिए शेल कंपनियों का इस्तेमाल शामिल है। जांचकर्ताओं के अनुसार, एक्स-रे मशीनें 33 लाख रुपये प्रति यूनिट की दर से खरीदी गईं, जो कि लगभग 10 लाख रुपये के मार्केट रेट से काफी अधिक थीं, जबकि ओआरएस (ORS) के पैकेट 2.5 रुपये के मार्केट रेट के बजाय 15 रुपये प्रति यूनिट की दर से खरीदे गए थे। इस मामले की विस्तृत जानकारी ANI News रिपोर्ट में दी गई है।
अदालत में जमानत याचिकाओं पर सुनवाई
18 अगस्त 2026 को, राऊँज एवेन्यू कोर्ट की स्पेशल जज विद्या प्रकाश ने मेडिकल ग्राउंड्स पर पूर्व डायरेक्टर जनरल ऑफ हेल्थ सर्विसेज (DGHS) डॉ. वत्सला अग्रवाल को चार हफ्ते की अंतरिम जमानत दे दी। कोर्ट ने 1 लाख रुपये का बेल बॉन्ड और उतनी ही राशि की दो जमानतें मांगी। 61 वर्षीय डॉ. अग्रवाल ने उच्च रक्तचाप (hypertension), टाइप II डायबिटीज, ब्रोंकियल अस्थमा और पुरानी दर्द की स्वास्थ्य समस्याओं का हवाला दिया था। इसके विपरीत, कोर्ट ने 17 अगस्त 2026 को सेंट्रल प्रोक्योरमेंट एजेंसी (CPA) के पूर्व हेड ऑफ ऑफिस डॉ. विनोद कुमार रंगा की रेगुलर बेल की अर्जी खारिज कर दी।
जांच का दायरा और अन्य आरोपी
यह जांच 2 जून 2026 को डायरेक्टरेट ऑफ विजिलेंस की छापेमारी के बाद एसीबी द्वारा दर्ज की गई एफआईआर से शुरू हुई थी। इस मामले में सीपीए के पूर्व डिप्टी कंट्रोलर ऑफ अकाउंट्स नीरज चोपड़ा और दवा सप्लायर राजीव रंगीला का नाम भी शामिल है। रंगीला, जिन पर फर्जी टेंडर तैयार करने का आरोप है, अभी भी फरार हैं। प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) भी 25 जून 2026 से प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, 2002 के तहत संभावित मनी लॉन्ड्रिंग की जांच कर रहा है।