दिल्ली में शनिवार, 26 सितंबर 2026 को होप फॉर डिमेंशिया कॉन्क्लेव 2026 का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में नीति निर्माताओं, डॉक्टरों और नागरिक समाज के नेताओं ने हिस्सा लिया। यह आयोजन 'होप एक आशा' संगठन की 25वीं वर्षगांठ के अवसर पर किया गया था। इस दौरान विशेषज्ञों ने कहा कि भारत की बढ़ती बुजुर्ग आबादी को देखते हुए देश को सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिक्रिया के तहत डिमेंशिया से बचाव, उसकी समय पर पहचान और देखभाल करने वालों के समर्थन को मुख्य प्राथमिकता बनानी चाहिए (Source)।
चर्चा के दौरान प्रतिभागियों ने भारत में डिमेंशिया संकट की गंभीरता पर प्रकाश डाला।
वर्तमान में 60 वर्ष से अधिक उम्र के लगभग 88 लाख भारतीय डिमेंशिया से पीड़ित हैं और यह आंकड़ा 2036 तक बढ़कर 1.69 करोड़ होने का अनुमान है। अपोलो अस्पताल के सीनियर कंसलटेंट न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. विनीत सूरी ने बताया कि वास्तविक मामलों की संख्या मौजूदा रजिस्ट्रेशन से चार से पांच गुना अधिक हो सकती है, जिसमें अल्जाइमर की हिस्सेदारी लगभग 70 प्रतिशत है।
विशेषज्ञों ने जोर देकर कहा कि जीवनशैली में बदलाव करके डिमेंशिया के बोझ को कम किया जा सकता है।
इसके लिए प्रतिदिन 30 से 45 मिनट शारीरिक व्यायाम और रात में 6 से 8 घंटे की नींद लेना जरूरी है। वक्ताओं ने नई प्रणालियां बनाने के बजाय मौजूदा स्वास्थ्य ढांचा में ही डिमेंशिया की जांच और इलाज को शामिल करने की सिफारिश की।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2026 के दिशा-निर्देशों के आधार पर पैनल ने उच्च रक्तचाप, मधुमेह और उच्च कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने पर जोर दिया।
इसके अलावा जोखिम कारकों को कम करने के लिए वायु प्रदूषण के संपर्क को कम करने और सुनने की क्षमता में कमी का इलाज कराने की बात कही गई। इस कॉन्क्लेव में प्रोफेसर मोना गुप्ता और ब्रह्माकुमारी की सिस्टर शिवानी जैसे वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे, जिसका उद्देश्य अनुसंधान, नीति और उद्योग के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के बीच आपसी सहयोग को बढ़ावा देना था ताकि एक मजबूत राष्ट्रीय रणनीति तैयार की जा सके।