जज पर टिप्पणी करना पड़ा भारी, CJP नेता रत्ना सिंह के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई की तैयारी

दिल्ली सरकार ने CJP नेता रत्ना सिंह के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की सहमति दी है।

Kittu Kumari4 November 20262 min read0 viewsDelhi Local
जज पर टिप्पणी करना पड़ा भारी, CJP नेता रत्ना सिंह के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई की तैयारी

दिल्ली सरकार ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की नेता रत्ना सिंह के खिलाफ आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की कार्यवाही शुरू करने की मंजूरी दे दी है। यह पूरा मामला सोशल मीडिया पर की गई उन टिप्पणियों से जुड़ा है, जिनमें आरोप लगाया गया था कि एक न्यायिक अधिकारी किसी अज्ञात 'मास्टर' के इशारे पर काम कर रहे हैं। सरकार के एडिशनल स्टैंडिंग काउंसिल (क्रिमिनल) अमोल सिन्हा ने इस मामले में अपनी राय देते हुए कहा है कि रत्ना सिंह के बयान प्रथम दृष्टया न्यायिक प्रक्रिया की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर प्रहार करते हैं, जिसके चलते दिल्ली हाई कोर्ट के अवमानना अधिकार क्षेत्र को लागू करने के पर्याप्त आधार मौजूद हैं।

पूरा विवाद साकेत कोर्ट के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट अभिनव पांडे के सामने चल रही एक कार्यवाही से शुरू हुआ। यह मामला रत्ना सिंह की दिल्ली पुलिस द्वारा कथित हिरासत से जुड़ा था, जिसमें 10 अक्टूबर को कोर्ट ने उन्हें मांगी गई राहत देने से इनकार कर दिया था। इस फैसले के बाद रत्ना सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने पोस्ट में लिखा कि "जज मास्टर की सेवा कर रहे हैं" और दिल्ली पुलिस के साथ-साथ जज भी "मास्टर के आदेशों का पालन" कर रहे हैं।

न्यायिक स्वतंत्रता पर सवाल उठाना गंभीर मामला

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वकील कौशिक चटर्जी द्वारा दिए गए आवेदन पर विचार करते हुए सरकारी काउंसिल ने स्पष्ट किया कि किसी न्यायिक आदेश की आलोचना करना कानूनी रूप से सही है और कोई भी व्यक्ति कानून के दायरे में रहकर फैसले की वैधता या तर्क को चुनौती दे सकता है। लेकिन, जब कोई व्यक्ति यह आरोप लगाता है कि जज किसी बाहरी प्रभाव या गलत इरादे से काम कर रहा है, तो वह आलोचना की सीमा पार कर जाता है।

अमोल सिन्हा ने अपनी राय में कहा कि बिना किसी तथ्यात्मक आधार के यह कहना कि एक न्यायिक अधिकारी बाहरी निर्देश पर काम कर रहा है, जनता के मन में यह धारणा बना सकता है कि न्यायिक निर्णय मेरिट के बजाय बाहरी दबाव में लिए जा रहे हैं। इस तरह के बयान अदालत के अधिकार को कम करते हैं और न्याय प्रशासन में जनता के विश्वास को कमजोर करते हैं।

हालांकि, इस मामले में CJP नेताओं सौरव दास और आशुतोष रंका से जुड़ी निवारक कार्यवाहियों और स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट प्रणाली पर की गई टिप्पणियों को अवमानना नहीं माना गया है। काउंसिल ने स्पष्ट किया कि वे बयान मुख्य रूप से दिल्ली पुलिस के आचरण और प्रशासनिक व्यवस्था की आलोचना थे, जिन्हें केवल कड़ा विरोध मानकर आपराधिक अवमानना की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

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