सौरभ भारद्वाज मानहानि केस: दिल्ली कोर्ट ने खारिज की परवेश वर्मा की याचिका, कहा- सवाल पूछना मानहानि नहीं

दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए AAP नेता सौरभ भारद्वाज के खिलाफ दायर आपराधिक मानहानि की शिकायत को खारिज कर दिया है। यह शिकायत परवेश वर्मा द्वारा दर्ज कराई गई थी, लेकिन अदालत ने मामले का संज्ञान लेने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सौरभ भारद्वाज द्वारा सोशल मीडिया पर किए गए दावे दरअसल सवाल पूछने जैसे थे और उन्हें मानहानि की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
पूरा मामला मई 2026 का है, जब पश्चिम दिल्ली के एक निजी स्कूल में हुई एक घटना को लेकर सौरभ भारद्वाज ने X (ट्विटर), इंस्टाग्राम और फेसबुक पर कुछ पोस्ट साझा किए थे। यह घटना POCSO एक्ट के तहत दर्ज एक मामले से जुड़ी थी। परवेश वर्मा का आरोप था कि इन पोस्ट्स के जरिए उनकी और उनके परिवार की छवि को नुकसान पहुँचाया गया है। उन्होंने अदालत में वीडियो क्लिप और ट्वीट पेश करते हुए कहा कि भारद्वाज ने उन पर झूठे आरोप लगाए कि वे मामले के आरोपी की मदद कर रहे हैं और उस स्कूल के ट्रस्ट से उनका संबंध है।
कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?
परवेश वर्मा की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सचिन पुरी ने दलील दी कि सौरभ भारद्वाज ने गलत तरीके से दावा किया कि स्कूल का ट्रस्ट उनका है और उन्होंने ट्रस्ट की फाइलें गायब करने में मदद की। वर्मा ने कोर्ट को बताया कि उनका या उनके परिवार का उस स्कूल या ट्रस्ट से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि वे चार बार चुनाव लड़ चुके हैं और उनकी एक राजनीतिक प्रतिष्ठा है, जिसे इन पोस्ट्स से ठेस पहुँची है।
परवेश वर्मा ने कोर्ट में बयान दर्ज कराते हुए कहा कि उनके दोस्तों और पार्टी कार्यकर्ताओं ने उन्हें व्हाट्सएप पर ये पोस्ट भेजे थे, जिससे उनकी छवि खराब हुई। हालांकि, एडिशनल चीफ जुडिशियल मजिस्ट्रेट (ACJM) नेहा मित्तल ने इन दलीलों को सुनने के बाद यह पाया कि पोस्ट में लगाए गए आरोप असल में सवाल थे। जब मजिस्ट्रेट किसी शिकायत पर संज्ञान लेने से इनकार कर देता है, तो मामला वहीं खत्म हो जाता है और आरोपी को कोई समन जारी नहीं किया जाता।
गौरतलब है कि इससे पहले 1 सितंबर 2026 को कोर्ट ने मेटा और X को निर्देश दिया था कि वे संबंधित डिजिटल लॉग्स को सुरक्षित रखें और परवेश वर्मा को उन पोस्ट्स में बदलाव या उन्हें हटाने से रोका था। लेकिन अब कोर्ट के इस फैसले के बाद यह कानूनी लड़ाई समाप्त हो गई है।