चेन्नई: कोडुंगयूर वेस्ट टू एनर्जी प्रोजेक्ट पर उठे सवाल, पर्यावरण और सेहत को लेकर बढ़ी चिंता
चेन्नई के कोडुंगयूर में वेस्ट टू एनर्जी प्लांट के पर्यावरणीय और स्वास्थ्य खतरों को लेकर विवाद बढ़ गया है। जानें क्या है पूरा मामला।

चेन्नई के कोडुंगयूर में रोजाना 2,100 टन कचरे को जलाने वाले एक विशाल वेस्ट टू एनर्जी प्लांट की योजना अब विवादों के घेरे में है। इस प्रोजेक्ट को लेकर पर्यावरणविदों और स्थानीय निवासियों ने अपनी आवाज उठाई है। विरोध की मुख्य वजह एक हालिया स्टडी है, जिसमें दावा किया गया है कि इस तरह के प्लांट से पैदा होने वाली बिजली की कार्बन तीव्रता बहुत अधिक होती है, जो पर्यावरण के लिए बेहद खतरनाक है।
नेशनल एलायंस फॉर क्लाइमेट एंड इकोलॉजिकल जस्टिस और सेंटर फॉर फाइनेंशियल अकाउंटेबिलिटी की 'द क्लाइमेट कॉस्ट ऑफ बर्निंग वेस्ट' रिपोर्ट ने चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में चल रहे चार ऐसे ही प्लांट प्रति यूनिट बिजली उत्पादन पर 3.4 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित करते हैं। यह राष्ट्रीय ग्रिड के औसत (0.727 किलोग्राम) से करीब 4.7 गुना ज्यादा है और यहां तक कि कोयले से होने वाले उत्सर्जन से भी 3.5 गुना अधिक है।
स्वास्थ्य जोखिम और नियमों की अनदेखी
ग्रेटर चेन्नई कॉरपोरेशन (GCC) इस प्रोजेक्ट पर करीब 3,500 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बना रहा है, लेकिन स्थानीय संगठन जैसे 'फेडरेशन ऑफ नॉर्थ चेन्नई रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन' (FNCRWA) और 'अलायंस फॉर इंसीनरेटर फ्री चेन्नई' (AIFC) इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि भारी कार्बन लागत के मुकाबले इससे मिलने वाली बिजली बहुत कम है। विशेषज्ञों ने इसके बजाय कंपोस्टिंग, रीसाइक्लिंग और बायोगैस जैसे विकल्पों को अपनाने की सलाह दी है।
इस विवाद को और हवा तब मिली जब कोडुंगयूर में पहले से चल रहे एक छोटे प्लांट की पोल खुली। जांच में पता चला कि ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016 के तहत जरूरी 48 पर्यावरणीय मानकों में से 45 की पिछले पांच सालों में एक बार भी निगरानी नहीं की गई। इसी वजह से GCC ने फरवरी 2026 में इसके संचालन को निलंबित करने का नोटिस जारी किया था।
इतना ही नहीं, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी इस मामले में शिकायत दर्ज की है। एक अध्ययन के अनुसार, प्लांट के 2 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले करीब 80% लोग सांस और त्वचा संबंधी बीमारियों से जूझ रहे हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि जलवायु कोष (Climate Funds) का इस्तेमाल ऐसे प्लांट के लिए करना 'जीरो-वेस्ट' के उद्देश्यों के बिल्कुल खिलाफ है।