AI के दौर में भी हाथों का जादू: दिल्ली के CR पार्क में बंगाल के कारीगरों ने फूंकी दुर्गा मूर्तियों में जान

आज के दौर में जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मशीनें हर काम को चंद सेकंड में पूरा कर रही हैं, वहीं दिल्ली के चितरंजन पार्क (CR Park) के एक कोने में कुछ हाथ आज भी पुरानी परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। 32 वर्षीय अभिजीत मंडल मिट्टी के ढेर और बांस के ढांचों के बीच मां दुर्गा की प्रतिमा को आकार दे रहे हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या AI यह काम कर सकता है, तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, "AI बहुत कुछ बना सकता है, लेकिन क्या वह इस अहसास और बारीकी को उतार पाएगा?"
दुर्गा पूजा में अब महज दो हफ्ते बचे हैं और CR पार्क की काली बाड़ी एक विशाल वर्कशॉप में तब्दील हो चुकी है। यहां बांस, कपड़ा, मिट्टी और रंगों का ऐसा संगम दिख रहा है जो आने वाले त्योहार की आहट दे रहा है। इस पूरी तैयारी के पीछे उन कारीगरों का हाथ है जो अपना घर और परिवार छोड़कर पश्चिम बंगाल से दिल्ली आए हैं। अभिजीत मंडल जैसे करीब 30 कारीगर इस सीजन के लिए बंगाल के अलग-अलग हिस्सों से यहां पहुंचे हैं।
बेहतर कमाई की तलाश और पुश्तै हुनर का संघर्ष
अभिजीत अगस्त में कोलकाता के कालीघाट से दिल्ली आए थे। वह यहां करीब तीन महीने बिताएंगे और न केवल मां दुर्गा, बल्कि सरस्वती, लक्ष्मी, गणेश और कार्तिक सहित उनके वाहनों की मूर्तियां भी तैयार करेंगे। इन कारीगरों के दिल्ली आने की सबसे बड़ी वजह यहां मिलने वाली बेहतर मजदूरी है।
- बंगाल में कमाई: वहां एक कारीगर को महीने के करीब 10,000 से 12,000 रुपये मिलते हैं।
- दिल्ली में कमाई: यहां यही आंकड़ा बढ़कर 15,000 से 16,000 रुपये तक पहुंच जाता है।
अभिजीत कहते हैं कि यह अंतर शायद बहुत बड़ा न लगे, लेकिन मौसमी काम करने वालों के लिए यह अतिरिक्त राशि बहुत मायने रखती है। विडंबना यह है कि जिन हाथों से पूरी दुनिया मां दुर्गा के स्वागत की तैयारी करती है, उन कारीगरों को खुद अपने घर और उत्सव को छोड़कर दूर आना पड़ता है।
अभिजीत के लिए यह काम सिर्फ रोजी-रोटी नहीं, बल्कि एक पारिवारिक विरासत है। आर्थिक तंगियों के कारण वे ज्यादा पढ़ाई नहीं कर पाए और अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए मूर्ति निर्माण की कला सीख ली। उनका मानना है कि मशीनें डिजाइन की नकल तो कर सकती हैं, लेकिन एक कलाकार की समझ और उसके हाथों का स्पर्श ही मूर्ति में सजीव भाव भरता है।
CR पार्क के निवासी भी इन तैयारियों को देखने के लिए उत्सुक रहते हैं। स्थानीय लोगों के लिए उत्सव की शुरुआत केवल कैलेंडर की तारीख से नहीं, बल्कि इन बांस के ढांचों और रंगों की खुशबू से होती है। यहां आने वाले लोग न केवल मूर्तियों को बनते देखते हैं, बल्कि पंडाल के डिजाइनों पर चर्चा भी करते हैं, जिससे यह पूरा माहौल उत्सव जैसा हो जाता है।