अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला ने दिल्ली स्कूल में बताया- कैसा था स्पेस से तिरंगा देखने का अहसास

Kittu Kumari9 October 20262 min read0 viewsDelhi Local
अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला ने दिल्ली स्कूल में बताया- कैसा था स्पेस से तिरंगा देखने का अहसास

भारतीय वायु सेना के ग्रुप कैप्टन और अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला ने दिल्ली के बिरला विद्या निकेतन स्कूल में छात्रों के साथ अपनी अंतरिक्ष यात्रा के रोमांचक अनुभव साझा किए। 9 अक्टूबर 2026 को आयोजित इस कार्यक्रम में उन्होंने बताया कि अंतरिक्ष की गहराइयों से भारतीय तिरंगे को देखना उनके लिए एक बेहद भावुक कर देने वाला पल था। उन्होंने छात्रों को प्रेरित करते हुए कहा कि अब आसमान भी उनकी सीमा नहीं है और उन्हें बड़े सपने देखने चाहिए।

शुभांशु शुक्ला ने अपनी इस यात्रा की बारीकियों पर चर्चा करते हुए बताया कि इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) का अंदरूनी हिस्सा तारों, गैजेट्स और लैब उपकरणों से भरा एक जटिल वातावरण है, जहाँ हर तरफ एक खास तरह की धातु जैसी गंध महसूस होती है। उन्होंने छात्रों को यह भी बताया कि माइक्रो ग्रेविटी के कारण अंतरिक्ष में उनकी लंबाई करीब पांच से छह सेंटीमीटर बढ़ गई थी, लेकिन पृथ्वी पर वापस आने के बाद स्पाइनल कम्प्रेशन की वजह से उन्हें आठ दिनों तक चलने में काफी परेशानी हुई।

स्पेस स्टेशन के अनुभव और वैज्ञानिक प्रयोग

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गगनयान कार्यक्रम के सदस्य और टेस्ट पायलट शुभांशु शुक्ला ने 26 जून 2025 को एक्सियम मिशन 4 के तहत निजी मिशन पर ISS जाने वाले पहले भारतीय बनकर इतिहास रचा था। जून-जुलाई 2025 के दौरान उन्होंने 18 दिन कक्षा में बिताए, जहाँ उन्होंने केरल से लाए गए चावल के बीजों पर शोध सहित कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रयोग किए। उन्होंने टीम वर्क और सुरक्षा के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि कड़ी ट्रेनिंग ही अंतरिक्ष यात्रियों को हर संभावित परिस्थिति के लिए तैयार करती है।

दार्शनिक नजरिए से बात करते हुए उन्होंने अंतरिक्ष यात्रा के प्रभाव का जिक्र किया और अंतरिक्ष यात्री विक्टर ग्लोवर की उस बात से सहमति जताई कि रॉकेट के शीर्ष पर कोई नास्तिक नहीं होता। अपनी इस पूरी यात्रा और अनुभवों को उन्होंने 'द सेकंड ऑर्बिट' नाम की किताब में संजोया है, ताकि आने वाली पीढ़ी प्रेरित हो सके।

शुभांशु शुक्ला की यह सक्रियता भारत के उन बड़े लक्ष्यों का हिस्सा है, जिसके तहत 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने और 2040 तक चंद्रमा पर इंसान को भेजने का लक्ष्य रखा गया है। इससे पहले अगस्त में उन्होंने गाजियाबाद में भी एक व्याख्यान दिया था।

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