जामिया हमदर्द में सिनेमैटोग्राफर असीम मिश्रा ने सिखाए फिल्म निर्माण के गुर, छात्रों से साझा किए अनुभव
सिनेमैटोग्राफर असीम मिश्रा ने जामिया हमदर्द के छात्रों को फिल्म निर्माण और विजुअल स्टोरीटेलिंग के गुर सिखाए। जानें उनके अनुभव।

दिल्ली के जामिया हमदर्द यूनिवर्सिटी में 'मीडिया मैटर्स: कनेक्टिंग पीपल, पॉलिसी एंड प्रोग्रेस' लेक्चर सीरीज के तहत एक खास सेशन का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में मशहूर सिनेमैटोग्राफर असीम मिश्रा ने शिरकत की, जिन्होंने छात्रों के साथ फिल्म निर्माण, विजुअल स्टोरीटेलिंग और सिनेमाई बारीकियों पर खुलकर चर्चा की। सेंटर फॉर मीडिया एंड मास कम्युनिकेशन स्टडीज (CMMS) द्वारा आयोजित इस सत्र में छात्रों को यह समझने का मौका मिला कि कैसे एक स्क्रिप्ट को पर्दे पर जीवंत किया जाता है।
असीम मिश्रा, जिन्होंने 'बजरंगी भाईजान', 'एक था टाइगर', 'पान सिंह तोमर', '83' और 'वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई' जैसी बड़ी फिल्मों में अपना काम किया है, ने बताया कि सिनेमैटोग्राफी केवल सुंदर शॉट लेने के बारे में नहीं है, बल्कि यह निर्देशक की सोच और कहानी को विजुअल्स के जरिए बयां करने की कला है। उन्होंने लेंस के चुनाव, कैमरा एंगल, लाइटिंग और कंपोजिशन के महत्व को समझाते हुए कहा कि तकनीकी फैसले हमेशा कहानी की मांग के अनुसार होने चाहिए।
फिल्म निर्माण की चुनौतियां और अनुभव
सेशन के दौरान मिश्रा ने अपनी चर्चित फिल्म '83' के बारे में बात की और बताया कि कैसे उन्होंने कैमरा पोजीशन और उपकरणों के चयन के लिए गहन रिसर्च की और बदलते मौसम के बीच शूटिंग को मैनेज किया। उन्होंने 'पान सिंह तोमर' में सुपर 16 मिमी फिल्म स्टॉक के इस्तेमाल और 'वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई' में किरदारों को उभारने के लिए चुने गए लेंसों के बारे में भी जानकारी दी।
सिर्फ फीचर फिल्में ही नहीं, बल्कि युद्ध क्षेत्र के अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने लेबनान में डॉक्यूमेंट्री बनाने के दौरान आई चुनौतियों का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि ऐसी अनिश्चित परिस्थितियों में सतर्कता, सहज ज्ञान और त्वरित निर्णय लेना कितना जरूरी होता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता जामिया हमदर्द के कुलपति प्रोफेसर (डॉ.) एम.जे. अब्दीन ने की, जबकि सीएमएमएस की डायरेक्टर प्रोफेसर (डॉ.) रेशमा नसरीन कन्वेनर रहीं। इस सीरीज की क्यूरेटर प्रोफेसर (डॉ.) फरहत बशीर खान ने असीम मिश्रा के साथ अपने पुराने दिनों को याद करते हुए एक दिलचस्प किस्सा सुनाया, जब उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया के एमसीआरसी में छात्रों को बेहद कम रोशनी में एक काली बिल्ली की फोटो खींचने का टास्क दिया था। उन्होंने बताया कि ऐसे अभ्यास छात्रों को तकनीकी कौशल और चुनौतीपूर्ण माहौल में ढलने में मदद करते हैं।
इस सत्र के अंत में एक शॉट-एनालिसिस वर्कशॉप और सवाल-जवाब का दौर चला, जिसमें छात्रों ने कैमरा इक्विपमेंट और फिल्म निर्माण की व्यावहारिक समस्याओं पर चर्चा की। प्रोफेसर खान ने जोर देकर कहा कि फ्रेमिंग, लाइटिंग और साउंड का सही तालमेल दर्शकों की सोच को प्रभावित कर सकता है, इसलिए मीडिया प्रोफेशनल्स के लिए विजुअल लिटरेसी बेहद जरूरी है।