अरावली से यमुना तक के प्राकृतिक जलमार्ग शहरीकरण और अवैध कब्जे से हुए पूरी तरह बर्बाद

दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में तेजी से हो रहे शहरीकरण, बड़े पैमाने पर अवैध कब्जों और प्रदूषण के कारण अरावली पहाड़ियों को यमुना नदी से जोड़ने वाले प्राकृतिक जलमार्ग पूरी तरह से टूट चुके हैं। इस रुकावट के कारण मानसून के दौरान जलभराव की समस्या बहुत बढ़ गई है और बचा हुआ पानी भी सीवेज मिलने से दूषित हो गया है। इतिहास के दस्तावेज इस बात की गवाही देते हैं कि अरावली से यमुना तक बारिश का पानी ले जाने वाली महत्वपूर्ण जल प्रणालियां पहले मौजूद थीं।
इतिहास के दस्तावेजों में 1883-84 और 1912 के दिल्ली गजट के साथ-साथ 1807 का एक ब्रिटिश हाथ से बना नक्शा शामिल है, जो इन प्राकृतिक जल प्रणालियों की पुष्टि करता है। इन प्रणालियों में बारहपुला, तेखंड और भूरिया नदियां जैसी प्राकृतिक धाराएं शामिल थीं। 1912 के गजट के अनुसार बारहपुला और भूरिया नदियों में मानसून का बहाव इतना तेज होता था कि मथुरा रोड को पार करना मुश्किल हो जाता था।
पर्यावरणविद डॉ. फैयाज खुदसर ने दिल्ली के भूमि उपयोग और भूमि आवरण में तेजी से हो रहे बदलावों को इस पर्यावरणीय गिरावट का मुख्य कारण बताया है। उन्होंने कहा कि इन छोटी नदियों के बाढ़ के मैदानों में बस्तियों के बस जाने से नदियों ने अपने मूल रास्ते खो दिए हैं। इसके अलावा स्थानीय घास और झाड़ियों की जगह आक्रामक विलायती कीकर (प्रोसोपिस जुलिफ्लोरा) के आने से प्राकृतिक परिदृश्य और अधिक प्रभावित हुआ है।
दिल्ली की मुख्य धाराओं के अलावा इसका असर फरीदाबाद क्षेत्र में भी देखा गया है। रिकॉर्ड से पता चलता है कि बड़खल पहाड़ियों से निकलने वाली परसौन धारा सहित कम से कम नौ अन्य धाराएं भी प्रभावित हुई हैं।