दिल्ली में युवाओं के 'कॉकरोच' प्रदर्शन पर सख्ती, अल जजीरा की रिपोर्ट ने उठाए सवाल

Kittu Kumari19 October 20262 min read0 viewsDelhi Local
दिल्ली में युवाओं के 'कॉकरोच' प्रदर्शन पर सख्ती, अल जजीरा की रिपोर्ट ने उठाए सवाल

राजधानी दिल्ली में बेरोजगारी और वोटर लिस्ट में गड़बड़ियों के खिलाफ युवाओं द्वारा किए जा रहे प्रदर्शनों और उन पर सरकार की कड़ी कार्रवाई ने अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी हैं। अल जजीरा इंग्लिश के प्रोग्राम 'द लिसनिंग पोस्ट' ने एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है, जिसमें दिल्ली में युवाओं और पत्रकारों के खिलाफ अपनाए गए 'कठोर रवैये' की आलोचना की गई है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे लोकतंत्र के आंगन में अपनी आवाज उठाने वाले युवाओं को दबाने की कोशिश की गई।

दरअसल, यह पूरा विवाद 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) जैसे समूहों द्वारा शुरू किए गए प्रदर्शनों से जुड़ा है। इन प्रदर्शनों का नाम 'कॉकरोच' इसलिए पड़ा क्योंकि कथित तौर पर भारत के मुख्य न्यायाधीश ने बेरोजगार युवाओं के लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया था। प्रदर्शनकारी स्नातक युवाओं में 29% से अधिक की भारी बेरोजगारी दर और चुनाव संबंधी चिंताओं को लेकर सड़कों पर उतरे थे।

पुलिसिया कार्रवाई और पत्रकारों की हिरासत

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अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, 10 अक्टूबर 2026 को अधिकारियों ने अनुमति में देरी का हवाला देकर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बड़ा सुरक्षा अभियान चलाया। सत्ता पक्ष के प्रवक्ता संबित पात्रा ने इन प्रदर्शनकारियों को 'अराजक तत्व' करार दिया। स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि 16 अक्टूबर तक 'तिरंगा मार्च' को रोकने के लिए करीब 25,000 पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती करनी पड़ी।

मानवाधिकार संगठन 'ह्यूमन राइट्स वॉच' ने इस crackdown के दौरान मनमाने ढंग से हिरासत में लेने, पिटाई और मोबाइल इंटरनेट बंद करने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। इतना ही नहीं, मीडिया कर्मियों को भी निशाना बनाया गया। 'कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स' के अनुसार, 10 और 11 अक्टूबर के बीच कम से कम 39 पत्रकारों को हिरासत में लिया गया, जबकि 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' ने करीब 40 मीडिया कर्मियों के साथ बर्बरता किए जाने की निंदा की है।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच सुप्रीम कोर्ट ने 11 अक्टूबर को एक अंतरिम आदेश जारी कर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की अवैध हिरासत पर रोक लगाई और दिल्ली मेट्रो व इंटरनेट सेवाओं को चालू रखने का निर्देश दिया। वहीं, जिनेवा में भारत के स्थायी मिशन ने संयुक्त राष्ट्र की चिंताओं को 'अनावश्यक हस्तक्षेप' बताकर खारिज कर दिया।

दिलचस्प बात यह है कि 18 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने एक अलग रुख अपनाते हुए कहा कि लोकतांत्रिक संस्थानों पर सवाल उठाने वाले युवा एक 'स्वस्थ संकेत' हैं और न्यायपालिका को नई पीढ़ी की बातों को सुनने के लिए तैयार रहना चाहिए। अल जजीरा की यह रिपोर्ट अब सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है, जो दुनिया का ध्यान दिल्ली की इन घटनाओं की ओर खींच रही है।

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