दिल्ली में महिला किसान सम्मेलन: अब मजदूर नहीं, 'उत्पादक' के रूप में पहचान पाएंगी महिलाएं

देश की खेती की रीढ़ मानी जाने वाली महिलाओं को अब केवल मजदूर नहीं, बल्कि उत्पादक और निर्णय लेने वाले उद्यमी के रूप में पहचान दिलाने की मुहिम शुरू हो गई है। इसी उद्देश्य के साथ दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में 'अखिल भारतीय महिला किसान सम्मेलन' का आयोजन किया गया। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2026 को 'अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष' घोषित किए जाने के उपलक्ष्य में आयोजित इस कार्यक्रम में देशभर से करीब 5,000 से 7,000 महिलाओं ने हिस्सा लिया।
भारतीय किसान संघ (BKS) द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में इस बात पर जोर दिया गया कि कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका को औपचारिक रूप से संस्थागत बनाया जाए। कार्यक्रम के दौरान यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि भारत में बुवाई से लेकर पशुपालन तक, खेती की करीब 60% से 80% गतिविधियां महिलाएं ही संभालती हैं, लेकिन उन्हें वह दर्जा नहीं मिलता जिसकी वे हकदार हैं।
विकसित भारत 2047 और गौ-कृषि का विजन
सम्मेलन को संबोधित करते हुए भारतीय किसान संघ के महासचिव मोहिनी मोहन मिश्रा ने कहा कि 2047 तक भारत को विकसित बनाने के विजन में 'गौ-कृषि-वाणिज्य' और जैविक खेती की मुख्य भूमिका होगी। वहीं, आरएसएस के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख राम लाल ने स्पष्ट किया कि सरकारी नीतियों में बदलाव की जरूरत है ताकि महिलाओं को केवल श्रमिक न मानकर उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में प्रमुख स्थान दिया जाए।
कार्यक्रम में कोटा कृषि विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर विमला डूनकवल ने भी बतौर अतिथि शिरकत की और उत्पादन एवं पोषण में भारतीय महिलाओं के बहुआयामी योगदान की सराहना की। सम्मेलन के दौरान मुख्य रूप से ऋण तक पहुंच, जहर मुक्त खेती और स्थानीय बाजार बुनियादी ढांचे के निर्माण जैसे गंभीर मुद्दों पर चर्चा की गई।
इस आयोजन का एक खास हिस्सा पुरस्कार वितरण समारोह रहा, जहां उन महिलाओं को सम्मानित किया गया जिन्होंने खेती के क्षेत्र में मिसाल कायम की है। इनमें शामिल हैं:
- सुनंदा साईसिंह: गौ-कृषि-वाणिज्य के लिए।
- दीपाली उरांव: जैविक खेती के लिए।
- कमला बेन: बीजों के संरक्षण के लिए।
- अंबा कालिंदी और पम्पा गराई: पशुपालन के क्षेत्र में।
- पुष्पा सिंह: रोजगार सृजन के लिए।
- माया सिन्हा महापात्रा, सुल्टा चटर्जी और शुक्ला बैरागी: खाद्य प्रसंस्करण के लिए।
भारतीय किसान संघ की अखिल भारतीय महिला संयोजक मंजु दीक्षित ने कहा कि महिला किसानों की स्थिति को पुनर्परिभाषित करने के लिए यह सम्मेलन बेहद जरूरी था। कार्यक्रम का समापन 'हम भारत की महिलाएं, समृद्धि लाएंगी' के नारे के साथ हुआ, जो कृषि नीतियों में लैंगिक समावेशिता की मांग को मजबूती से पेश करता है।