वायु प्रदूषण से बढ़ रहा है GI कैंसर का खतरा, विशेषज्ञों ने की भारत-विशिष्ट रिसर्च की मांग

भारत में बढ़ते वायु प्रदूषण का असर अब केवल फेफड़ों या दिल तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह शरीर के आंतरिक अंगों और कैंसर के जोखिम को भी बढ़ा रहा है। नई दिल्ली में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान चिकित्सा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि वायु प्रदूषण, विशेष रूप से PM2.5 और ग्राउंड-लेवल ओजोन, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल (GI) कैंसर के बढ़ते मामलों का कारण हो सकते हैं। विशेषज्ञों ने अब इस विषय पर भारत-विशिष्ट गहन शोध की तत्काल आवश्यकता जताई है।
सर गंगा राम अस्पताल और यूके के द क्रिस्टी एनएचएस फाउंडेशन ट्रस्ट द्वारा 10 और 11 अक्टूबर, 2026 को आयोजित इस सम्मेलन में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। अस्पताल में मेडिकल ऑन्कोलॉजी के चेयरमैन डॉ. श्याम अग्रवाल ने बताया कि पांच साल पहले 15 साल जैसी कम उम्र के मरीजों में GI कैंसर के मामले देखना बहुत दुर्लभ था, लेकिन अब यह बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि जहाँ PM2.5 और PM10 पर काफी चर्चा होती है, वहीं ग्राउंड-लेवल ओजोन जैसे प्रदूषकों की अनदेखी की जा रही है, जिस पर बारीकी से नजर देने की जरूरत है।
युवाओं में बढ़ते मामले और वैश्विक डेटा
सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी के चेयरमैन डॉ. सौमित्र रावत ने इस बात पर जोर दिया कि युवाओं में बढ़ते कैंसर के मामलों के पीछे जीवनशैली, खान-पान, जेनेटिक्स और पर्यावरणीय कारकों का एक जटिल मिश्रण हो सकता है, जिसकी व्यापक जांच जरूरी है। वैश्विक स्तर पर भी इसके प्रमाण मिल रहे हैं। साल 2026 के एक रिव्यू में 70 अध्ययनों का विश्लेषण किया गया, जिसमें पाया गया कि लंबे समय तक PM2.5 के संपर्क में रहने से GI कैंसर, खासकर कोलोरेक्टल कैंसर से होने वाली मृत्यु दर बढ़ जाती है।
इसके अलावा, 'नेचर हेल्थ' में प्रकाशित एक अध्ययन में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसे प्रदूषकों और कैंसर के जोखिम के बीच संबंध देखा गया है। हालांकि, विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि ये अध्ययन केवल संबंधों को दर्शाते हैं, सीधे तौर पर कारण साबित करने के लिए और अधिक डेटा की आवश्यकता है। डॉ. आदित्य सरिन के अनुसार, PM2.5 का पुराना संपर्क शरीर में ऐसे सेलुलर बदलाव लाता है जो कैंसर के विकास में सहायक होते हैं।
प्रदूषण का असर केवल पेट के कैंसर तक ही सीमित नहीं है, बल्कि महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। फोर्टिस गुरुग्राम की डॉ. रमा जोशी ने बताया कि एक देशव्यापी अध्ययन के अनुसार, जिन महिलाओं ने 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक PM2.5 का सामना किया, उनमें समय से पहले मेनोपॉज और देरी से मेंार्च (menarche) होने का खतरा काफी बढ़ गया। इसका सबसे ज्यादा असर उत्तर भारत के दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के हिस्सों में देखा गया है।
अब विशेषज्ञों की मांग है कि भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) और इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) जैसे संस्थान मिलकर स्थानीय डेटा एकत्र करें, ताकि भारतीय परिवेश में प्रदूषण और कैंसर के इस घातक संबंध को समझा जा सके और समय रहते बचाव के उपाय किए जा सकें।