AIIMS दिल्ली के डॉक्टरों ने वीआईपी कल्चर के खिलाफ उठाई आवाज, समान इलाज की मांग
AIIMS दिल्ली के डॉक्टरों ने अस्पताल में वीआईपी कल्चर के खिलाफ आवाज उठाई है और सभी मरीजों के लिए समान इलाज की मांग की है।

देश के प्रतिष्ठित संस्थान AIIMS दिल्ली के डॉक्टरों ने अस्पताल परिसर में हावी 'वीआईपी कल्चर' के खिलाफ एक गंभीर चेतावनी जारी की है। डॉक्टरों का स्पष्ट कहना है कि प्रभावशाली व्यक्तियों को मिलने वाला विशेष व्यवहार न केवल अनुचित है, बल्कि यह स्वास्थ्य सेवाओं की निष्पक्षता और समानता के लिए एक बड़ा खतरा है। उनका मानना है कि अस्पताल के नियम सभी मरीजों के लिए एक समान होने चाहिए ताकि सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित किया जा सके।
इस गंभीर मुद्दे पर AIIMS दिल्ली के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी प्रोफेसर डॉ. एम. डी. रे और उनकी छात्रा डॉ. हेमा सिरी कुट्टू ने एक शोध के जरिए 'वीआईपी सिंड्रोम' से जुड़ी चिकित्सा और नैतिक चुनौतियों को उजागर किया है। शोध में यह बात सामने आई है कि जब सीमित संसाधनों वाले अस्पतालों में चिकित्सा जरूरत के बजाय सामाजिक रसूख को प्राथमिकता दी जाती है, तो इससे मानक उपचार प्रोटोकॉल (Standard Treatment Protocols) में बदलाव करना पड़ता है, जो मरीज की सेहत के लिए जोखिम भरा हो सकता है।
संसाधनों का वितरण क्लिनिकल जरूरत पर हो, रसूख पर नहीं
इस समस्या से निपटने के लिए डॉ. कुट्टू ने कुछ कड़े सुझाव दिए हैं। उन्होंने कहा कि अस्पतालों में भर्ती होने के लिए सख्त मानदंड, डिस्चार्ज की पारदर्शी नीतियां और स्पष्ट संचार रणनीतियां होनी चाहिए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि अस्पताल के संसाधन किसी के सामाजिक स्तर के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी क्लिनिकल जरूरत के आधार पर वितरित किए जाएं। हालांकि, विशेषज्ञों ने यह भी माना कि अगर हाई-प्रोफाइल व्यक्तियों के लिए विशेष सुविधाएं दी जाती हैं और उससे अन्य मरीजों के इलाज या पहुंच में कोई बाधा नहीं आती, तो वह स्वीकार्य हो सकता है, लेकिन इसके लिए डॉक्टरों को हमेशा सतर्क रहना होगा।
गौरतलब है कि AIIMS दिल्ली में यह विवाद नया नहीं है। अक्टूबर 2022 में संस्थान ने मौजूदा सांसदों के इलाज के लिए विशेष मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी की थी, जिसके बाद फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन (FAIMA) जैसे समूहों ने कड़ा विरोध किया था। भारी दबाव के बाद संस्थान को उस निर्देश को वापस लेना पड़ा था।
वहीं, स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता लाने के लिए केंद्र सरकार ने अब अस्पतालों को निर्देश दिया है कि वे अपनी सेवाओं के शुल्क अंग्रेजी और स्थानीय भाषाओं में प्रमुखता से प्रदर्शित करें। इसके अलावा, स्वास्थ्य अधिकारियों ने कार्डियोलॉजी, ऑन्कोलॉजी और न्यूरोसर्जरी जैसे विशेष क्षेत्रों में एक बार इस्तेमाल होने वाले सर्जिकल उपकरणों (Single-use disposable items) के दोबारा उपयोग पर सख्त पाबंदी लगाई है, क्योंकि इससे बैक्टीरिया, एचआईवी और हेपेटाइटिस बी और सी जैसे गंभीर संक्रमणों का खतरा बढ़ जाता है।